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मंज़िल नज़र भर है, राही सफ़र पर है।

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फिर वही मन

Posted on June 1, 2015 by RAHUL RAHI
ना जाने किसके ख्वाब में,
तरसती हैं आँखें सोने को,
मंज़िल से प्यारी लगती हैं राहें,
भटकने को खोने को ।

क्यों अनजाने यार के,
दीदार में राही का मन है,
खुशियों की फिराक में,
मजबूर है रोने को ।

तस्वीर पिरोने लगे खयाल,
ज़ेहनों के बन्दे करे बवाल,
बेख़ौफ़ चले नाकामी से,
दरिया में आँग डुबोने को ।

ना जाने किसके ख्वाब में…।।

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