Skip to content

rahulrahi.in

मंज़िल नज़र भर है, राही सफ़र पर है।

Menu
  • Home
  • hindi poems
  • hindi articles
  • hindi stories
Menu

आम औरत बड़ी शख़्सियत – Great women of my life – hindi article – women’s day special

Posted on March 5, 2018December 9, 2024 by RAHUL RAHI

मेरे जन्म की कहानी ज़रा अजीब ही है। पूरी फ़िल्मी ही है। कुछ हालतों के चलते यह नौबत आ गई कि डॉक्टर साहब बोल पड़े कि बच्चे और माँ में से सिर्फ़ एक को ही बचाया जा सकता है। मैं इस दुनिया और भीतर की दुनिया के बीच की काँपती सी दहलीज़ पर खड़ा अपने पैदा होने का इंतज़ार कर रहा था। एक बात तो साफ़ है कि आप यह आर्टिकल पढ़ पा रहे हैं – मैं जीवित हूँ। तो क्या मेरी माता जी नहीं रही? ईश्वर की दया से वह भी सही सलामत हैं।

आनन फ़ानन में वक़्त के पहले ही मैं इस दुनिया में प्रकाशित हो गया। एक काँच की पेटी में लगभग एक अंजुली भर की, अधमरी जान को सहेज कर रखा गया। मेरी माँ के उस कड़े फ़ैसले की बदौलत मैं आज इस दुनिया को देख पा रहा हूँ, लेकिन कहानी अभी यहाँ ख़त्म नहीं हुई थी। एक माँ की प्रसव पीड़ा शिशु के जन्म के बाद समाप्त हो जाती है लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं था। माँ को यह पीड़ा उसके बाद भी जारी रही। मेरी काँच की पेटी और माँ का कक्ष दोनों ही अलग मंज़िलों पर था। तो माँ वहाँ की प्रधान परिचरिका की सहायता से उस असहनीय दर्द के साथ बस मेरी एक झलक पाने के लिए नीचे उतरती, कुछ क्षण मेरी बंद आँखों को निहारती, बस इसी आस में कि मैं जीवित रहूँगा, और चली जाती।

स्त्री एक भाव है, पुरुष उसके बिना ‘अ’भाव है।

स्कूल के दिनों में मेरी हस्त लेखा बहुत ही घटिया थी। मैं ख़ुद भी शायद ही उसे पढ़ पाता था। मैं दूसरी कक्षा उत्तीर्ण कर चुका था और नवाबों की तरह अपने ग्रीष्मावकाश का आनंद दिनभर टी.वी. देखकर और क्रिकेट खेलकर कर रहा था। मेरी दिन चर्या बड़ी ही सधी हुई और ऐश-ओ-आराम में चल रही थी। लेकिन एक दुविधा इन आराम के दिनों में मेरे समक्ष आ खड़ी हुई – २ पन्ने सुलेख। सुलेख का मतलब तो आप समझते ही होंगे। एक जगह अपनी तशरीफ़ को जमाकर एक एक अक्षर बिल्कुल साफ़ – साफ़ मोतियों की तरह पन्नों पर उकेरना। दिन के किसी भी वक़्त मुझे लिखने की इजाज़त थी लेकिन मेरे लिए वह बड़ा ही ऊबा देने वाला पल होता था। माँ को भी पता था कि मैं किस वक़्त घर से बाहर खेलने के लिए दौड़ने वाला था। वह ठीक उसी वक़्त मुझ पर पाबंदी डाल देती। मन मारकर मैं उस सुलेखन के लिए बाधित था। उसका नतीजा यह है कि मेरी लेखनी बहुत उमदा है।

अब मैं ज़रा घर से बाहर निकलता हूँ। पड़ोस की एक नानी माँ जो मुझे अक्सर घूमने ले जाया करती, मेरी घुमक्कड़ प्रवृत्ति की ज़िम्मेदार हैं। अब बात ऐसी हो गई कि जब वह नए कपड़े पहनकर तैयार हो जाती, मुझे भनक पड़ ही जाती कि अब ये कहीं ना कहीं तो जाने वाली ही हैं, मैं तुरंत दौड़कर बन ठन के उनके सामने नारद मुनि सा प्रकट हो जाता। हारकर वो मुझे लेकर चल देती। मेरे पहले के दिनों में उनकी ही बदौलत मैं विभिन्न प्रकार के लोगों से मिल पाया। जिस जगह मेरा बचपन बीता वहाँ लगभग सभी प्रकार के जात-पात के लोग थे। विभिन्न लोग, इसका मतलब अलग अलग रीति – रिवाज़ और अलग खानपान। उन सभी विभिन्न गृहणियों के हाथों में अलग अलग प्रकार का जादू था। मराठी पुरणपोली, गुजराती मीठी कढ़ी, राजस्थानी दाल-बाटी-चूरमा, उत्तर प्रदेश का निमौना और मेरी माँ के हाथ का आलू का पराँठा। ये गृहणियाँ मिलकर किसी भी पाँच सितारा होटेल को पछाड़ सकती हैं।

Some more articles :[ख़ुश रहें बेहतर जिएँ] [लाल ख़ून तेरा शुक्रिया] [ज़माने के तीसरी आँख]

भीतरी दर्द का असली एहसास भी मुझे पहली बार तब हुआ जब पड़ोस में ही रहनेवाली एक युवती जिन्हें मैं बुआ कहकर पुकारता था, अकाल मृत्यु की भेंट चढ़ गई। अपनी पाँचवीं कक्षा के पहले दिन को मैं उन्हें कहकर सुनाना चाहता था। वो अक्सर कुछ ले आया करती थी हम बच्चों के लिए। विशेषत: हमारी पढ़ाई – लिखाई के बारे में उन्हें बहुत ध्यान था। अपनी गली में घुसते ही एक सन्नाटा सा पसरा महसूस हो रहा था। लेकिन मेरी ख़ुशी की बुलंदियाँ मुझसे कह रही थी कि बुआ घर पर हैं। हाँ वो घर पर थी, लेकिन सफ़ेद कफ़न में। एक कुआँरी आँखें बंद किए, माँग में सिंदूर लगाए। पहली बार बहुत क़रीब से देखा थी किसी को ऐसे, भागकर पास ही के एक घर में फूट – फूटकर रोया था। तब पता चला था कि क्या होता है असली दर्द किसी अपने के खोने का।

स्कूल की बात करूँ तो मेरी जो सबसे अच्छी मित्र भी एक लड़की थी। पढ़ने में तेज़, खेलने – कूदने में आगे। एक आदर्श थी मेरे लिए। मैं पढ़ने लिखने में एक आम विद्यार्थी ही था जो बस फ़ेल नहीं होता था। लेकिन बीजगणित का बीज कभी भी मेरे भीतर उग नहीं पाया और मेरे दिमाग़ की बंजर ज़मीन को मेरी उस आदर्श मित्र ने कई बार बिना किसी हिचक के बेहतर ढंग से सींचा।

स्कूल – कॉलेज ख़त्म हुआ और वो पल आया जिसका इंतज़ार हर इंसान अपनी ज़िंदगी में करता है। मेरा पहला प्यार। वो हुआ उस वक़्त जब मुझे उसकी तलाश बिल्कुल भी नहीं थी। लेकिन ग़ैर होकर भी एक अपनापन, एक मीठा एहसास जो उसने मुझे दिया मैं कभी उसे भूल नहीं पाऊँगा। उसके द्वारा मिले ढाई अक्षरों के कारण मैं प्रेम को बेहतर ढंग से समझ पाया और लिख पाया। बिन माँगे किसी को कुछ दे देना, थोड़ा सा ही सही, वहीं से सीखा मैंने। कोई सुख – दुःख का साथी बना, कोई व्यक्तित्व सँवारने लगा, कोई संगीत का साथी, तो कोई लिखने में सहायक। क्या नहीं सीखा मैंने इन स्त्रियों से!!! आप सोचेंगे कि फिर पुरुषों का कोई हाथ ही नहीं रहा क्या मेरे जीवन में। नहीं मित्र ऐसी बात नहीं।

Some more tags :[अनाम प्रेम] [मेरे अनुभव]

मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, लता मंगेशकर, साईना नेहवाल, सानिया मिर्ज़ा इत्यादि ऐसे बहुत से नाम हैं जो हमारे इतिहास और वर्तमान से जुड़े हैं, सूची बड़ी ही लम्बी है। मैं इन नामी गिरामी लोगों में से व्यक्तिगत तौर पर किसी को भी नहीं जानता लेकिन जिन्हें भी मैं जानता हूँ आम होते हुए भी उनकी शख़्सियत मेरी नज़र में बड़ी है। मेरा और किसी भी पुरुष का कोई वजूद इस दुनिया में स्त्रियों के बिना असम्भव है। स्त्री एक भाव है जिसके बिना पुरुष ‘अ’भाव है। आपके जीवन की कहानी भले ही मेरे जैसी ना हो लेकिन आपके भी आस – पास ऐसी महिलाएँ अनेक रूप में होंगीं जिन्होंने आपके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा होगा। उन सभी को नमन।

 

3 thoughts on “आम औरत बड़ी शख़्सियत – Great women of my life – hindi article – women’s day special”

  1. Unknown says:
    May 22, 2021 at 3:25 pm

    Very Nice and heart touching article.. I just liked it..

    Reply
  2. Unknown says:
    May 22, 2021 at 3:25 pm

    Well done Sir, really awesome articles. I just liked it..good luck..

    Reply
  3. primeboime says:
    April 11, 2025 at 12:49 pm

    You can certainly see your skills within the work you
    write. The arena hopes for more passionate writers like you who are not afraid to say how they believe.
    Always go after your heart.

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

© 2026 rahulrahi.in | Powered by Superbs Personal Blog theme