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मंज़िल नज़र भर है, राही सफ़र पर है।

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एक पत्थर

Posted on December 3, 2014 by RAHUL RAHI
एक पत्थर मैं उठाऊं, एक पत्थर तू उठा,
तोड़ देँ अपनी ज़मीनें, बाँट लें अपना खुदा ।

हक़ जमालें पत्थरों पर, कर लें सबकुछ मुट्ठी में,
कैद कर जग की खुदाई, बनलें हम खुद ही खुदा ।

कैसे कैसे लोग कैसे, खून के प्यासे बने,
करते कत्ल ए आम और, बदनाम करते हैं खुदा ।

होके सबसे हताश मैंने, ये सयाही पलटी है,
होके यूँ अनजान जाने, तू कहाँ बैठा खुदा ।

या फिर एक पत्थर मैं उठाऊँ…

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