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भावनाओं के वश में

Posted on June 18, 2015 by RAHUL RAHI

जब भी लिखने की इच्छा जागी, वो पैसे कमाने के लिए या किसी को इम्प्रेस करने के लिए नहीं, लेकिन दिल में दबी किसी बात या इच्छा को बाहर निकालने के लिए हुई । अपनी बात कहने के लिए, सुनाने के लिए कोई होती नहीं अपनी डायरी के अलावा । इसीलिए यही तरीका मैंने अपनाया कि अपनी सोच feelings, अपनी भावनाएँ यहाँ लिख देता हूँ ।

अक्सर हम अपनी भावनाओं के वश में कई चीज़ें कर देते हैं । कभी गुस्सा, कभी प्यार, कभी उदासी, कभी कुछ, कभी कुछ और फिर कुछ अनचाहा हो जाने के बाद हमें यह एहसास होता है कि मुझे तो यह नहीं करना चाहिए था । सिर्फ एक पागल इंसान ही ऐसा होगा जिसे अपने कृत्य के बारे में पता नहीं होगा । ऐसा मेरे साथ भी अक्सर हो जाता है । और जब से मैंने इस बात पर गौर किया है, तब से ऐसा लगता है जैसे कि एक किमिया, masterkey मेरे हाथ लग गई हो । वो है देखने की, observation की ।

आप सोच रहे होंगे कि भला इससे क्या होता होगा । होता सिर्फ यही है कि यह एक सिग्नल की तरह काम करता है । सड़क पर आप कार चला रहें हों और दूर ही लाल बत्ती दिखाई दे तो आप ब्रेक लगा कर पहले ही रुकने लग जाते हैं और सही समय पर आपकी गाड़ी भी थम जाती है । और जैसे ही ग्रीन सिग्नल होता है आप चल देते हैं । ठीक उसी तरह खुद को देखने से, ऑब्सर्वेशन से आप गुस्से को आता हुआ देखते हैं और गुस्सा विलीन हो जाता है । भावना वश आप ख़ुशी में कोई वादा नहीं कर देते और गुस्से में किसी को श्राप नहीं चिपकाते ।

आज की दुनिया फायदे – नुकसान वाली है तो आप सोच रहे होंगे कि इससे फायदा क्या होगा । ऊपर दिए गए दोनों ही हालातों में आप गलत फैसले लेने से बचेंगे, अपनो के करीब रहेंगे, अपने मन के जाल में फ़सने से बचेंगे ।

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