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मंज़िल नज़र भर है, राही सफ़र पर है।

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Jeevan ki local / जीवन की लोकल

Posted on March 27, 2016 by RAHUL RAHI

दो पटरियों पे वो दौड़ें है,

ले जाती है वो राही को,
अनजाने हमराही को,
बेगाने से सिपाही को, जो,
जूझता है, लड़ता रहता है,
मन के लाखों स्टेशन पर,
आती जाती भावों की ट्रेन,
कोई धीमी और कोई तेज़,
वो उसे दिशाएँ देती हैं,
और उसे बहा ले जाती हैं,
बिन पूछे बिना कहे कुछ भी,
बस आती जाती रहती है,
जो ध्यान ना दे राही तो,
जो चूक गया अपना स्टेशन,
तो भटकेगा, पछताएगा,
कब आए जाने वो स्टेशन,
फिर उसे भी आख़िर तक जाना,
और जाकर लौटना फिर होगा,
बस रहे ख़याल, ना आए सवाल,
जो आए क़िस्मत का स्टेशन,
वरना है लगा आना – जाना…
ऐसी है जीवन की लोकल…

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