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मेरे जज़्बात – Feeling of Writers – ग़ज़ल

Posted on September 16, 2017 by RAHUL RAHI

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मेरे जज़्बात – mere jazbat – ग़ज़ल

जज़्बातों से जब भी मेरा दिल भर भर आता है,
चलती है कलम बस मुझसे रहा नहीं जाता है।

क्या क्या गुज़री है जब भी, चुप चाप रह जाता हूँ,
पूछते हो तुम मुझ से, तू लिख कैसे पाता है।

मुझे नहीं है इल्म ऊँचे – ऊँचे लफ़्ज़ों का,
पन्नों पर गिरता है जो भी ऊपर से आता है।

जो एहसास मुझको शायद तुझे भी वैसा होगा,
तभी तो खामोशी में तू ये आँखे पढ़ पाता है।

पल – पल को हालात के हाथों से जो घाव मिला,
कलम मेरी भरता है साहिब रहम नहीं खाता है।

पढ़ता हूँ हम वक्त और तारीख के फनकारों को,
अलग है सबका हुनर मगर क्यूँ एक नज़र आता है।

माना हर कोई है दर्द की शाम का परवाना,
लेकिन सच जलता है जो ठोकर मुँह की खाता है।

कौड़ी के भावों में तो बिकते रंगीं पत्थर,
सोना वो कहलाता है जो तप कर बाहर आता है।

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